स्वयं सहायता समुह, गरीब परिवार के लिए वर्दान


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मनोज सोनकर आरंग। ऐसे लोग जिनके पास न तो बैंक में गिरवी रखने के लिए कोई संपत्ती है और नही बैंक को दिखाने के लिए कोई ऐसे दस्तावेज जिसे दिखा कर बैंक से लोन लिया जा सके। ये लोग इतने षिक्षीत भी नहीं होते की बैंक जाकर अपनी बातों को रख सके ये तो बैंक जाने के नाम से भी डरते हैं, एसे लोगों के लिए ही यह स्वयं सहायता समुह एक वर्दान बनकर सामने आया है। 

जैसा की नाम से ही समझ में आता है कि कोई ऐसा समुह जो स्वयं अपनी मदद करता है, अब ऐसे लोग अपनी एक समुह बनाकर साप्ताहीक कुछ पैसे अपने समुह में जमा करने का फैसला करती है।  ऐसे समुह में 15 से 20 सदस्य या इससे ज्यादा सदस्य भी हो सकते हैं, जो हर सप्ताह कुछ निःष्चित पैसे जमा करते हैं और इस जमा पैसे को किसी सदस्य को न्यूनतम ब्याज पर दे देते हैं, क्योंकि ये सदस्य आपसी पहचान के होते हैं जिसके कारण पैसे वापस करने मे ज्यादा परेषानी नहीं होती और न ही कोई पैसे वापस करने से इंकार कर सकता हैं, और न ही किसी प्राकर का कोई दस्तावेज समुह में जमा करने की जरूरत होती है, इसके पहले ये लोग गांव के साहूकार, लाला, दलाल जैसे लोगों से ही पैसा लेते थे जो कि साल का लगभग 60 प्रतिषत के दर से ब्याज वसुल करता था, जिसके कारण इन गरीब परिवारों को आजीवन साहूकार के यहां कार्य करना पडता था या उनकी पूरा पुरखा उस ब्याज को पटाते ही रहता था। 

देखा जय तो स्वयं सहायता समुह में अधिकतर महिलाएं होती है जिसके कारण समुह में पैसों का वापस मिलने की संभावना बहुत बढ जाती है, क्योंकि ये महिलाएं एक दूसरे के रिस्तेदार या पडोसी होती है जिसके कारण वे एक दूसर को अच्छी तरह से जानती पहचानती है। चूंकि स्वयं सहायता समुह का पैसा सभी सदस्यों का ही पैसा होता है, इस लिए आपसी आपसी संमांजस्व और सहयोग के भावना समुह में बनी रहती है। ये सभी महिलाएं एक ही निःष्चित जगह के होने के कारण ये सामाजीक कार्यक्रमों में भी अपनी भागीदारी देती है।

जब ये स्वयं सहायता समुह ऐसा लगतार करने लगती है तब ये समुह बैंक में अपने सभी लेन देन को दिखाते हुए लोन के लिए आवेदन कर सकती है, जब बैंक इनके लेन देन से संतुश्ट हो जाती है तब बैंक इन्हें न्यूनत ब्याज दर पर लोन दे देती है। इसी तरह ये स्वयं सहायता समुह लगातार अगे बढने के साथ-साथ समुह के सदस्यों को भी आगे बढाती रहती है।


स्थापना कहां हुई

सेल्फ हेल्प ग्रुप की स्थापना सन 1970 में बंगलादेष से हुई। इसकी सुरूवात करने मोहम्मद युनुस थे, जिनहे सन 2006 में नोबल पुरूशकर से सम्मानित किया गया।


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